ये किस्सा एकदम, मस्त बन गया है
वो, जो गुलदस्ता दिया था तूने, दश्त बन गया है
उसे देखने, नहीं आएगा क्या
चिट्ठी की गेंद, मुझपर फेंकने नहीं आएगा क्या
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं
तेरा नाम लिखकर, खूब नाम बटोरा है मैंने
महफिलों में, बेहिसाब इनाम बटोरा है मैंने
जानेवाले सुन, यूँ ज़ालिमों की तरह न जा
तेरे हिस्सा का भी, इल्ज़ाम बटोरा है मैंने
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं
दीवार फांद कर, एक और सुबह निकली है
मैं अकेला नहीं, तेरी यादें भी इस दफा निकली है
जाने ये किस्मत से, मेरी बनती क्यों नहीं
एक बार फिर, ये होकर खफा निकली है
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं