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भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं

ये किस्सा एकदम, मस्त बन गया है
वो, जो गुलदस्ता दिया था तूने, दश्त बन गया है
उसे देखने, नहीं आएगा क्या
चिट्ठी की गेंद, मुझपर फेंकने नहीं आएगा क्या
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं

तेरा नाम लिखकर, खूब नाम बटोरा है मैंने
महफिलों में, बेहिसाब इनाम बटोरा है मैंने
जानेवाले सुन, यूँ ज़ालिमों की तरह न जा
तेरे हिस्सा का भी, इल्ज़ाम बटोरा है मैंने
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं

दीवार फांद कर, एक और सुबह निकली है
मैं अकेला नहीं, तेरी यादें भी इस दफा निकली है
जाने ये किस्मत से, मेरी बनती क्यों नहीं
एक बार फिर, ये होकर खफा निकली है
तू शायद जानता नहीं, तेरी पहचान बने घूम रहा हूँ मैं
भीड़ में, एक इंसान बने घूम रहा हूँ मैं

Hindi Poetry

"جنوزامیں جِنِک....!"

آزمانک
“جنوزامیں جِنِک….!” (1917 )
(پشتو ادب ءِ اولی آزمانک)

آزمانکار:… راحت زاخیلی
رجانک:… ھلیل بلوچ

مرجان ءِ چمّ مرگئی ءِ سرا کپت انت- آئی شیر ءِ وڑا گُرّگ ئےِ جت ءُ چمّ ئےِ سُہر ترینت اَنت ءُ گُشت یے mais 60 palavras

Urdu

मैं खुद को, नीलाम करते आया हूँ

एक समय की बात है, छोड़ो क्या बताऊं
ये अधूरे जज़्बात है, छोड़ो क्या बताऊं
बता दूं, किसी से कहोगे तो नहीं
यार मगर तुम, चुप भी रहोगे तो नहीं
ज़ाती बात भी, सरेआम करते आया हूँ
यूँ ही तो मैं खुद को, नीलाम करते आया हूँ

तुम्हारी बात भी, यूँही कही होगी
और तुम भी तो, वहीं रहीं होगी
कुछ ऐसा ही तो है, किरदार अपना
वादा भी कैसे करूँ, दोबारा नहीं होगी
ज़ाती बात भी, सरेआम करते आया हूँ
यूँ ही तो मैं खुद को, नीलाम करते आया हूँ

डरता हूँ, कुछ ज्यादा न बोल जाऊं
दबे राज़, बेकार ही न खोल जाऊं
है मुश्किल बड़ा, हक़ीक़त से ओझल रहना
ऐसे कैसे मैं, खुद को उलझाऊँ
ज़ाती बात भी, सरेआम करते आया हूँ
यूँ ही तो मैं खुद को, नीलाम करते आया हूँ

Hindi Poetry

मेरे पड़ोस में एक सड़क है

मेरे पड़ोस में एक सड़क है
जहाँ से लगातार शोर आता है,
शोर गाड़ियों का,
गाड़ियों के हॉर्न का,
गाड़ियाँ ऐसे दौड़ती है जैसे
टायरों से दुनिया को घुमाना चाहती हो,

Life

मेरे दोस्त, ख़्वाब देखेगा क्या

शिकवे सारे, पीछे छोड़ दूँ
हर मुमकिन बात को, मोड़ दूँ
इस कदर अपनउँ तुझको
आ मेरे पास, तुझको ओढ़ लूँ
हैं कितने पहने, नक़ाब देखेगा क्या
मेरे दोस्त, ख़्वाब देखेगा क्या

महक ले आएंगे, कलियों की क्यारियों से
हिसाब उनका करवाएंगे, आला व्यापारियों से
वो पर्ची मेरे प्यार की, संभाल कर रखना
उलझ न जाए कहीं, काला बाजारियों से
हैं कितने पहने, नक़ाब देखेगा क्या
मेरे दोस्त, ख़्वाब देखेगा क्या

हाथ पकड़, पंजा लड़ेंगे
ज़रूरत पड़ी, तो इसीके सहारे आगे बढ़ेंगे
तू लिख अपने तरीके से, मैं अपने से लिखूंगा
दोनों मिलकर, लंबी दास्तान गढ़ेंगे
हैं कितने पहने, नक़ाब देखेगा क्या
मेरे दोस्त, ख़्वाब देखेगा क्या

Hindi Poetry